Sunday, July 5, 2015

नामकरण प्रकरण



भारत देश मे आमो की अनेक प्रजातीय पायी जाती है। सफेदा, लंगड़ा, हापुस तथा दशहरी एवं चौसा इनमे प्रमुख है। एन प्रजीतिया का नामकरण किनही विशेष परिस्थितियो मे किया गया। यह पर हम किशय से संबन्धित दशहरी आम के नामकरण पर ही विचार करेंगे।
दशहरी आम का नामकरण भर जाती से उतप्न्न दशरथ नामक एक किसान से हुआ है। उसी के नाम पर दशहरी गाँव का नाम भी रखा गया है। दशहरी गांफ लखनऊ से पश्चिम, हरदोई मार्ग पर, नागर से 13 किलोमीटर दूर ककोरी शहीद-स्मारक से उत्तर रेलवे की हाबड़ा-अमृतसर लिने से उस पार डेढ़ किलोमीटर दूरी पर बसा है। इस गावे मे ही दो सदियो पुराना पेड़ है जो संसार भर मे दशहरी आम का पहला पेड़ होने का गौरव रखता है।
लखनऊ मे दशरी गाँव के ताल्लुकेदारों की “दशहरीकोठी” है जो झाऊलाल पल और कचहरी रोड के बीच मे है और “दशहरी हाउस” के नाम से प्रसिद्ध है। दशहरी हाउस के वर्तमान नवाब सैयद मुहम्मद असर जैदी बताते है की दशहरी गाँव सहित उसके आसपास का इलाका भरो की सम्पत्ति था। भरशीवो का प्रभाव अवध क्षेत्र मे सदियो तक बना रहा। उन्ही भरो से नवाब के पूर्वजो ने इस पूरे इलाके को खरीद लिया। इसमे वह प्रसिद्ध दशहरी गाँव भी सम्मिलित था।
ऐसा कहा जाता है की दशरथ नामक एक भर जाती का किसान अपने आम की बागों  से पके आमो की तीन आदमियो के साथ तोड़कर बेचने के लिए जा रहा था। डोलची मे भरे हुये आमो को सिर पर रखकर जब ये चार वक्ती जा रहे थे तभी जोरों का तूफान आ गया। आँधी के साथ तेज बारिस होने लगी। इन चारो व्यक्ति आमोस ए भरी हुई डोलचियों को साथ एक जगह उड़ेलकर ऊपर से डोलची(झउवा) को औंधे रख दिये। मूसलाधार बारिस तथा तेज़ आँधी से वे चरो घबरा गए। काही सर छिपाने के लिए सुरक्षित स्थान भी नहीं था। किसी तरह प्राण बचाकर वे घर पाहुचे। कंपकपी से उनके बदन मे जैसे शक्ति नही रह गयी। इस तरह 13 दिन तक अनवरत बारिस जारी रही।तब तक समूचा आम सद चुका था। इन सादे आमो की देर से एक एक करके सभी अंकुरण जमे पर एक साथ निकले। अंकुरक का प्रांकुर तथा मुलांकुर संयुक्त रूप से निकला। हवा पानी तथा प्रकाश तीनको के आधार से एक ही विशाल वृक्ष का रूप ले लिया। संजोग से जहा यह अंकुरण निकला वह जमीन भी दसरथ के अधिकार क्षेत्र मे थी। उसकी देख-रेख स्वयम दशरथ करता था। समय बीतने के साथ साथ उस वृक्ष के आमो की मिठास और फलो के आकार की चर्चा सर्वत्र फैलने लगी। अब यह आम दावतों मे तोहफे के रूप मे दिया जाने लगा। कौन लाया यह आम? राज महल में चर्चा होने लगी अरे भाई ! दशरथी भर लाया । इस प्रकार दशरथी से आगे निकलता हुआ यह आम दशहरी कहलाने लगा । इसकी गुठली की पूछ होने लगी और आज इस आम को अनेक जगहो पर देखा जा सकता है । यधपी इस आम के मिठास और आकार में जब अंतर होने लगा है फिर भी आज इसकी प्रसिद्धि  वैसी ही बनी हुई है।
अनेक एटिहासिक साक्ष्यों के  आधार पर यह अवधारणा पुष्ट होती है की भारत के पूर्वोत्तर प्रांतो मे भरो की प्रधानता थी। उनके द्वारा निर्मित किए गए दुर्ग, खाइयां, नहरे, बांध एवं सुरंगे अभ अनवरत विनष्ट होती जा रही है  पर उनके संरक्षण का भारतीय इतिहास संरक्षण मण्डल कोई समुचित प्रयास नहीं कर रहा है। वह दिन दूर नही जब ये समग्रियासदैव के लिए विलुप्त हो जाएंगी। यदि किसी को मिटाना है तो सर्वप्रथम उसके इतिहास के सम्पूर्ण साक्ष्यों को मिटा दिया जाये। इसी पदचिन्ह पर आज चला जा रहा है। जब लोगो को अपने अतीत का ज्ञान नहीं रहेगा तब वे बिना पाठ के रही बनकर चलेंगे ही। इतिहास वर्तमान समस्याओ को सुलझाने के लिए मार्ग प्रसस्त कराता है। जिसका इतिहास नही उसके लिए वरमान मार्ग अंधकरमय रहेगा ही।
आज भी भौत से गाँव, शहर, कस्बे और जिले जो मौजूद है, भरो के नामो प ही उनका नामकारण हुआ है। मुगल साम्राज्य के पहले तथा बुद्ध काल के बाद इंका अधिकतर नामकरण हौ है। मध्य भारत तथा उत्तर भारत के अनेक परगने भर-शासको के द्वारा निर्मित तथा नमकरीत किए गए थे। “टी ट्राइब्स एंड कास्ट्स” वाल्यूम द्वितीय पृष्ट 3, मे डब्ल्यू क्रूक कहते है कि-
“वास्तव मे अवध और पश्चिमोत्तर प्रांत का पूरी भाग जिसमे बसे प्रत्येक कस्बे जिंका नाम अंत मे पुर, आबाद या मऊ से खतम नहीं होता, भरो से संबन्धित कहा गया ।“
इसी तथ्य को एम. ए. शेयरिंग ने अपनी प्रसिद्ध कृति “ट्राइब्स एंड कास्ट्स” वाल्यूम प्रथम, पृष्ट 358 मे स. ए. इलीयट के दिये उधारण कि पुष्टि करते है-
“अधिकतर प्रत्येक नगर जिनके नाम के अंत मे पुर, आबाद या मऊ नही लगा रहता है या स्पस्थ रूप से उनके नाम व्युत्पत्ति विषय से संबन्धित नहीं है अवध के पूरब मे इतिहास द्वारा  प्रदर्शित भरो के नगर है।
डाक्टर ओपर्ट ने अपने ग्रंथ “ओरिजिनल इन है बीटेंट्स आफ भारतवर्ष” वाल्यूम दो, पृष्ट- 2-20 , 37 , Sqq के माध्यम से “तालमी के बढ़ई (Barrhai of ploemy)  से एक पर्वतीय जनजाति सबरस, बार्बरा, वारबरा या बरबेरियन, जिंका संबंध भारत जाती के संबंध उद्घृत किया गया है, से संबंध रखने का सुझाव दिया गया है। अत्यधिक संख्या मे पाये जाने वलसे स्थानीय नामो के मूल शब्दो कि व्युत्पत्ति अपर इण्डिया  मे इसी नामो से हुई है, जैसे कि बिहार, बहराइच , बाराबंकी , बरेली, बारहज, बरहर और या तक बनारस भी , इत्यादि को अत्यधिक सावधानी से दृततापूर्वक इसे स्वीकार किया गया है”
डाक्टर गुस्तव ओपर्ट दी ओरिजनल इनहाइवितेंट्स आफ भारतवर्ष आर इण्डिया पृष्ट 42 मे कहते है की जनरल कनिंघम सोचता है की अधिकतर शब्द या अक्षर का भार जो भरो के प्राचीन अवशेषो से जुड़ा है उनकी प्राचीन प्रसिद्ध परंपरा से करीब- करीब नामो से ही बना है। इन तथ्यो अवध गजेटियरभाग एक पृष्ट 35, से भी होती है, अबुल फजल द्वारा लिखित आईने अकबरी के कर्नल एच एस जैरेट तथा सर जदुनाथ रकर द्वारा अङ्ग्रेज़ी अनुवाद, वाल्यूम द्वितीय पृस्ठ 172 पर दिये गए नोट से भी इसी तथ्य को स्वीकार किया ज्ञ है यह नोट विंस मेमोयरभाग एक पृष्ट 33 द्वारा तैयार किया गया है-
बुद्ध धर्म के प्रभूतत्व के समकाल मे भरजती के लोग बहुत शक्तिशाली थे अवध के दक्षिण तथा पूर्वी भागों मे उनकी संपत्ति तथा शक्ति के रूप मे तालाब, कुए, खाईया और उजड़े हुये ईटों द्वारा निर्मित किलो तथा कस्बो के अनेक भग्नावशेष पाये जाते है
जे एच हट्ट्न के मतानुसार बुद्धकालीन भरो के नाम पर ही बिहार प्रांत का नामकरण किया गया है जो उस प्रांत मे अधिक शक्तिशाली थे। आजमगढ़ की कुँवर और मघई नटियो का नामकरण भी भरो के नाम पर किया गया। अकबर के शासनकाल अबुल फजल उसके नवरतनों मे से एक था जिसने आईने अकबरीकी रचना की। इस ग्रंथ मे इलाहाबाद सूबे, आग्रा सूबे, अवध सूबे, के जीतने परगनो का वर्णन दिया गया है वे अधिकतर भरो के नामो पर ही नमकरीत किए गए है। इन विवरणो से ज्ञात होता है की भदोही परगना (जिसमे गंगा के किनारे पर बसा भरो का एक किला भी है), क्षेत्रफल-73252 वीघा, 2 विश्वा, राजस्व-3,660,918 दाम , सुयूरघल-37,534 द्दम, घुड़सवार-200, पैदल सिपाही 5000 तथा जिसमे भरो की प्रधानता थी। कलिंजर सूबे, (जिसमे भी भरो का एक किला विद्धमान है) के परगना राशन जिसका क्षेत्रफल 11998 वीघा , 10 विश्वा,राजस्व 5,12026 दाम , घुड़सवार 50 पैदल सिपाही 100 मे भी भरो की जनसंख्या अधिक थी।
यह पर हम कुछ चुने हुये मुख्य स्थलो के विवरण साक्षों के साथ प्रस्तुत कर रहे है जबकि छोटे छोटे स्थानों के नांकरणों को छोड़ रहे है।
भर / राजभर साम्राज्य पुस्तक से लिया गया
पृस्ठसंख्या 49 से 51
लेखक – श्री  एम बी राजभर
(मग्गूराम बंगल राजभर)
{राजभर रत्न }


2 comments:

  1. मा मुख्य सचिव महोदय , महाराष्ट्र शासन मंत्रालय मुम्बई
    विषय :- महाराष्ट्र प्रदेश की जातियों की वी जे एन टी/ओ बी सी /एस बी डब्लू डिपार्टमेंट के अधीनस्थ मागास (ओ बी सी /डी एन टी आयोग) में वर्ष 1998 से भर,भार राजभर जाति को जातियों की सूची में नवीन प्रविष्टि हेतु योजित प्रत्यावेदन का त्वरित परीक्षण कर निस्तारण के संबंध में :-
    महोदय,
    कृपया उपरोक्त विषयक का संदर्भ ग्रहण करने का कष्ट करें ! जिसमें महाराष्ट्र प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अस्थायी/स्थायी/विस्थापित रूप से लाखों की संख्या में निवासरत भर Bhar- synonyms राजभर Rajbhar जाति जो कि सामाजिक ,शैक्षणिक, आर्थिक आदि क्षेत्रों में अत्यंत पिछड़ी हुई है को प्रदेश की ओ बी सी /वी जे एन टी की जातियों के समकक्ष है ! (वर्तमान में उक्त भर जाति प्रदेश की अनुसूचित जातियों की सूची में अंकित है परंतु कतिपय कारणो से प्रमाणपत्र नहीं मिलता है तथा प्रमाणपत्र न मिलने की दशा में )उपरोक्त जातियों की सूची में भर,भार, राजभर के नाम से नवीन प्रविष्टि हेतु उक्त समुदाय के सामाजिक संस्था राष्ट्रीय राजभर सेवा संघ महाराष्ट्र द्वारा पत्रांक 02/98 रा रा से सं /1998 द्वारा नियमानुसार अधियाचना योजित है तथा उक्त प्रकरण में निहित प्रक्रिया के अनुसार वांछनीय प्रामाणिक अभिलेख व साक्ष्य संस्था द्वारा सुनवाई के दौरान मा आयोग को उचित माध्यम द्वारा पूर्व में ही उपलब्ध कराया जा चुका है ! सूच्य है कि उक्त मूल जाति भर Bhar -translation error कहीं कहीं उक्त को ही भार अंकित है जो कि तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत में *बॉम्बे प्रेसिडेंसी* के होम डिपार्टमेंट के शासनादेश सं *2396/3/4 व 2396/3/1 दिनाँक 2 मार्च 1934* द्वारा तत्समय कुल 28 अपराधशील जनजातियों में से क्रमांक 20 पर *क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट इनक्ययारी कमेटी 1939* की रिपोर्ट के पृष्ठ सं 15 व 16 पर अंकित है तथा उक्त भर जाति को तत्कालीन *यूनाइटेड प्राविन्सेज ऑफ अवध* से अर्थात मूलतः उ प्र(अब) से *माइग्रेट* विस्थापित होना स्पष्ट रूप से उल्लिखित है !तथा 15 की जनसंख्या में तत्समय उक्त जाति भर को सी टी एक्ट 1871 धारा के तहत प्रतिबंधित बताया गया है ! फिर भी अभी तक प्रकरण आयोग स्तर पर विलम्बित है जिससे मामले के निराकरण न होने से इस समुदाय के लोग मूलभूत संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो रहे हैं !तथा लोगों में निराशा की भावना बलवती होती जा रही है !
    अतएव आपसे प्रबल अनुरोध है कि वर्णित परिस्थितियों में अनुरोधनुसार मानवीय आधार पर भर,भार, राजभर जाति को महाराष्ट्र प्रदेश की जातियों की सूची में समाविष्ट किये जाने हेतु तत्सम्बधित को निर्देशित करना चाहें !
    सममान सहित भवदीय
    डॉ पंचम राजभर
    सोशल एक्टिविष्ट आवास -दुबरा बाज़ार आज़मगढ़ उ प्र

    Comment By Social Justice and Special AssistanceToken ID: Dept/VJNT/2019/1087 Department : Social Justice and Special Assistance Status: ResolvedDate: 16/05/2019Plus-Minus
    Token ID: Dept/SJSA/2018/4940 Department : Tribal Development Status: ClosedDate: 17/09/2018Plus-Minus
    Token ID: Dept/VJNT/2018/434 Department : Vimukta jatis , Nomadic Tribes , Other Backword Classes and Special Backward Classes Welfare Department Status: In ProgressDate: 12/04/2018Plus-Minus
    Token ID: Dept/VJNT/2018/433 Department : Vimukta jatis , Nomadic Tribes , Other Backword Classes and Special Backward Classes Welfare Department Status: In ProgressDate: 12/04/2018Plus-Minus
    Token ID: Dept/VJNT/2018/432 Department : Vimukta jatis , Nomadic Tribes , Other Backword Classes and Special Backward Classes Welfare Department
    [09/11,/2019- 19:18] Dr Pancham Rajbhar: Dear Citizen,
    Your grievance has been successfully submitted on Grievance Redressal Portal
    (https://grievances.maharashtra.gov.in/ )
    Details are as follows:
    # Category Details
    1 Grievance Token No Dept/VJNT/2019/1089
    2 Submission Date & Time 2019-05-18 23:20:14
    3 Name drprajbhar1962
    4 Mobile No 9889506050
    5 Email Id drprajbhar1962@gmail.com
    6
    District & Taluka & SRO Name
    & Service Name Mumbai City & Mumbai City
    7 Department Social Justice and Special Assistance
    8 Nature of Grievance No Data Available
    9
    Grievance (first 300
    characters)
    सेवाम , मा मुय सिचव महोदय , महाराट शासन मंालय मुबई िवषय :- महाराट देश
    की जाितय की...

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  2. Send by-drprajbhar1962@gmail.com - Email--26/12/2019-
    Word Press -Respond to this post by replying above this line
    New post on Site Title-
    1118-
    by drprajbhar(Dr Pancham Rajbhar)
    आदरणीय श्री अजय देवगन जी ,साभिवादन

    महोदय,
    यह जानकर अपार हर्ष हुआ कि आप जैसे प्रसिद्ध फ़िल्म कलाकार एक चर्चित लेखक श्री अमिश त्रिपाठी जी द्वारा लिखित पुस्तक बैटिल ऑफ बहराइच कहानी के आधार पर एक ऐसे महापुरुष के बारे में फ़िल्म बनाने के लिए तत्पर हैं जो 11 वीं सदी के भारतीय राष्ट्रनायक तत्कालीन श्रावस्ती राज्य के सम्राट भारशिव नागवंशी भर समाज के कुलगौरव महाराजा सुहेलदेव राजभर जी जिन्होंने तत्समय पूरे भारत के लिए धर्मान्धता व आतंक का पर्याय बना विदेशी दुर्दांत आक्रांता सैयद सलार मसऊद ग़ाज़ी मियाँ का लगभग एक लाख सैनिकों सहित अपनी विशेष युद्धनीति व रणकौशल से सेना सहित उसका भी बध किया ,वह भी ऐसे समय जब सलार मसूद पूरे देश के राजाओं को परास्त करते हुए अपने तलवार के बल पर इस्लाम धर्म को कबूल न करने वालों लोगो का सरेआम कत्लेआम कर अधीनता स्वीकार करने वालों को धर्म परिवर्तन कराते पूरे देश में हाहाकार मचाये था ! ऐसे आततायी का श्रावस्ती नरेश ने क्षेत्रीय राजाओं को एकजुट कर उनका नेतृत्व करते हुए निर्णायक युद्ध जीतकर राष्ट्रधर्म मानव धर्म व सनातन धर्म की रक्षा किया ! परंतु खेद है कि ऐसे महान शूरवीर पराक्रमी मानवीय धर्म रक्षक राष्ट्रभक्त के राष्ट्रीय योगदान की भारतीय समाज व इतिहासकारों/साहित्यकारों/लेखकों द्वारा उन्हें यथोचित सम्मान न देकर उनके वास्तविक जीवन वृतान्तों को दबाया व छिपाया गया !
    लेकिन यह प्रसन्नता का विषय है कि आप द्वारा ऐसे परम प्रतापी,कुशल देशभक्त के जीवन चरित्र सहित उनके सुकृत्यों को समाज के पटल पर आमजनमानस को देश भक्ति व समाजसेवा की प्रेरणा हेतु सबके समक्ष रखे जाने का सुंदर प्रयास किया जाना अत्यंत हर्ष का विषय है ! जिसके लिए आप साथियों सहित बधाई के पात्र हैं और निश्चित रूप से महाराजा सुहेलदेव राजभर के वंशज करोङो करोङों उनके अनुयायियों में प्रसन्नता की लहर है !
    आपसे सिर्फ एक अनुरोध है कि महाराजा सुहेलदेव जी के जीवन परिचय की कड़ी में कुछ अपुष्ट प्रमाणों के आधार पर कुछ भ्रांतियां पैदा करने की कोशिश अवांछनीय तत्वों द्वारा की गई है फिर भी वैसे तो किसी राष्ट्र के महापुरुष/राष्ट्रभक्त तो उस मातृभूमि सहित देश की धरोहर होते हैं तथा उन्हें किसी विशेष वर्ग,जाति के परिधि में नही रखा जा सकता है ऐसा विभक्त करना उनके राष्ट्रीय कद का अपमान है परंतु प्राचीन काल से ही इस देश मे वर्ण व्यवस्था के आधार पर जातियों में विखंडित प्रचलित मान्य प्रथाओं के अनुसार भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विधान के अनुरूप उनके माता, पिता ,राज्य क्षेत्र , कुल,वंश ,जाति सामाजिक,राजनीतिक, सांस्कृतिक संरचना आदि के बारे कहीं कहीं साजिशन जानबूझकर कुछ अप्रामाणिक रूप से भिन्नता पैदा कर सामाजिक विद्वेष पैदा किया गया है जैसे कि महाराजा सुहेलदेव जी के जाति के संबंध में सभी प्रामाणिक अभिलेख में भारशिव नागवंशी भर/राजभर जाति का स्पष्ट रूप से उल्लेख कर बताया गया है लेकिन कुछ चंद चालक मगर धूर्त लोगो ने उन्हें बिना प्रमाण के ही कहीं कहीं अन्य जाति बताने का कुत्सित प्रयास कर समाज मे विघटन पैदा करने का दुस्साहस व भ्रम पैदा किया हैं ! जो कि अत्यन्त निंदनीय है !
    अतः आपसे आग्रह है कि प्रस्तावित फ़िल्म का निर्माण वास्तविकता के आधार पर करें हमारे जैसे उनके तमाम वंशजों की हार्दिक शुभकामनाएं आपके साथ इस आशय के साथ हैं कि वास्तविकता के आधार पर जीवन वृतान्तों का चित्रण करें !कृपया अपना कॉन्टैक्ट नंबर व ईमेल आईडी पुनः प्रदान करने का कष्ट करें ,जिससे कि आपको महाराजा के जीवन वृतान्तों के सम्बंध में प्रामाणिक अभिलेखों की प्रतियां भेजकर वस्तुस्थिति से आपको अवगत कराया जा सकें ! जिससे निर्विवाद रूप से कार्य संचालित होता रहे !इन्ही आशा व उम्मीद सहित सहयोग की अपेक्षा में, सद्भावना सहित
    भवदीय
    डॉ पंचम राजभर -सोशल एक्टिविष्ट/Ex- राष्ट्रीय महासचिव-अखिल भारतीय राजभर संगठन @पूर्व संपादक - सुहेलदेव स्मृति (मासिक पत्रिका)- आवास- कुरथुवा सोनहरा आज़मगढ़ उ प्र 276301/ मो 9889506050/9452292260 एमएल drprajbhar1962@gmail.com

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